10/01/2021
जय बीकाणा,,
राठौड़ो में साफ़ा पहनने की परम्परा कैसे शुरू हुई -
मारवाड़ के राठौड़ इस मरू भूमि पर 13 वीं शताब्दी में आयें थे । इतिहासकारों के अनुसार राठौड़ उत्तर प्रदेश के बदायूँ से मारवाड़ में आयें । प्रथम पुरुष राव सिहाजी थे जिन्होंने मारवाड़ के पाली क्षेत्र पर अधिकार कर राठौड़ सत्ता की स्थापना की थी । आगे चलकर इनके वंशजों ने खेड़ अौर मंडोर पर अधिकार कर वे मारवाड़ के अधिपति बने ।
राठौड़ मरू प्रदेश से नहीं थे इसलिये इनकी वेश भूषा यहाँ के वातावरण के अनुकूल नहीं थी लेकिन यहाँ आने के बाद धीरे धीरे अनेक परम्पराएँ अौर कई रिवाज नए स्थापित हुए जिनके पीछे बहुत सी घटनाए है जो तत्कालीन समय में घटित हुई थी । इन्हि घटनाओं ने नवीन परम्पराओं को जन्म दिया जो आज एक पहचान बन गए हैं ।
इतिहास में बड़ी रोचक घटना हैं जिसके कारण राठौड़ों ने साफ़ा ( पगड़ी ) पहनना शुरू किया । इसके बारे बहुत कम जानकारी होने से लोग इसे नहीं जानते ।
राव सिहाजी के छटे वंशज राव जालणसीजी हुए। ये बड़े वीर और साहसी थे 14 वीं शताब्दी में इनके राज्यकाल में एक घटना घटी जिस कारण इन्होंने उमरकोट के सोढ़ो पर आक्रमण कर दिया । इस युद्ध में राव जालणसीजी ने सोढ़ो के सरदार का साफ़ा ( पगड़ी ) छिन लिया ।
उस काल में साफ़े का बड़ा महत्त्व था । सिर से पगड़ी का गिरना या पगड़ी दुश्मन के पेरों में आ जाए तो समझ लो पराजय हो चुकी हैं । एक प्रकार से साफ़ा आन बान ओर शान का प्रतीक था ।
राठोड़ो ने साफ़ा विजय स्वरूप पाया था इसलिए उन्होंने इसे विजय के प्रतीक के रूप में सिर पर धारण किया अौर इस प्रकार राठौड़ो ने उस दिन से साफ़ा बाँधना शुरू किया ।
मुग़लों के सम्पर्क में आने पर पाग ओर पगड़ी के कुछ पेच बदले जो प्रचलन में आये लेकिन साफ़ा सदैव प्रचलन में बना रहा । युद्ध में विशेषरूप से साफ़ा धारण किया जाता था । आगे चल कर इस साफ़े को बाँधने के अनेक पेच ( style ) बने जैसे जोधपुरी जिसमें पीछे छूरंगा होता हैं , गोल साफ़ा आदि ।
मारवाड़ का जोधपुरी साफ़ा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। मारवाड़ से जितने भी राठौड़ निकले यथा बीकानेर , किशनगढ़ , सीतामाउ , रतलाम , झाबुआ , ईडर आदि सभी रियासतों में इसका प्रचलन हैं तथा कुछ बदलाव के साथ यही साफ़ा बाँधा जाता हैं ।
जिस प्रकार फ़ैशन बदलती हैं लेकिन मारवाड़ का यह साफ़ा आज भी अपने पेच के लियें प्रसिद्ध हैं इसको प्रसिद्धी दिलवाने का श्रेय मारवाड़ के वर्तमान नरेश महाराजा गजसिंहजी को जाता हैं , जिनके नाम पर गजशाही साफ़ा बहुत प्रसिद्ध है ।
महाराजा साहिब की प्रेरणा से ही मालानी राड़धरा के सपूत स्वर्गीय डाँ.महेंद्रसिंहजी नगर साहब जो मेहरानगढ़ के पूर्व महानिदेशक थे ने राजस्थान की पाग पगड़ियों पर शोध करके अति महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी थी जिसके कारण पाग पगड़ियाँ के महत्व को लोग जानने लगे । विदेशो में भी साफ़ो की प्रदर्शनियाँ करके इन्होंने बड़ा नाम कमाया ।
राठौड़ो के इस गौरवशाली साफ़े का प्रादुर्भाव उमरकोट सिंध कि देन हैं । आगे चलकर यह सिंध
का प्रदेश उमरकोट भी मारवाड़ के अधीन आ गया जो स्वतंत्रता के समय तक मारवाड़ का अभिन्न अंग था ।
साफ़ो की अनेक कहानियाँ हैं जो आज भी जनमानस में लोगों के ज़ेहन में बसती हैं यदि इन्हें आज पीढ़ी सहेज कर रखे तो निसंदेह एक ऐतिहासिक कार्य होगा । प्रत्येक वर्ग के कर्म के आधार पर साफ़ा अलग अलग पेच का बँधता हैं । जोधपुरी साफ़ा नौ मीटर का होता है ।
अब तो लोग साफ़ा देखा देखी बाँधते लेकिन वे उसका सम्मान नहीं करना जानते । जब तक सम्मान नहीं होगा तब तक ये साफ़े साफ़े नहीं कहलाएँगे ।
डाँ. महेन्द्रसिंह तँवर