Apni Haat

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28/08/2022

तंबूरा बजा कर शिव गाथा सुना रहे सूरदास जी

30/07/2014
AAJIVIKA VIKAS KA SADHAN HAI APNI HAAT
30/07/2014

AAJIVIKA VIKAS KA SADHAN HAI APNI HAAT

SBHI KO ROJGAAR KARNE KE AWASAR HAI.
30/07/2014

SBHI KO ROJGAAR KARNE KE AWASAR HAI.

30/07/2014

आयोजक – मातृभूमि विकास संस्थान,लखनऊ
सहयोग – उत्तर प्रदेश सहभागी वन प्रबंध एवं निर्धनता उन्मूलन परियोजना,महोबा वन प्रभाग महोबा
अध्ययन
ग्राम स्वराज्य प्रहरी प्रशिक्षण संस्थान,बाँदा उत्तरप्रदेश

अपनीहाट
महोबा जिले के सालट गांव में साप्ताहिक बुधवार को लगने वाली अपनीहाट बेरोजगारों को रोजी&रोटी का साधन बन सकेगी। यह बात हाट स्थापना के समय समझ से परे थी। साप्ताहिक अपनीहाट की जरूरत को पहले कभी गांव वालों ने नही समझा। जब एक स्वैच्छिक संगठन के शिल्पी ने गांव के परिवारों की जरूरतों को समझा और बेरोजगारों की फेहरिस्त को देखा तो नेक सलाह दे डाली । इस सलाह को गांव के वासिन्दों के संगठन संयुक्त वन प्रबन्ध समिति के सदस्यों ने आपस में विचार-विमर्श कर स्वीकार कर लिया ।
साप्ताहिक अपनीहाट उत्पादन एवं जरूरत की वस्तुओं के लेन-देन केन्द्र का स्थान सभी ने स्कूल के पास मैदान वाले गांव के एक गलियारे को चुना। और अपनी हाट के शुभारम्भ की तैयारी गांव वालों ने मिलजुल कर पूरी की। मातृभूमि विकास संस्थान के कार्यकर्ता और अपनीहाट के शिल्पी पंकज “बागवान” ने अपनीहाट शुभारम्भ दिवस पर आयोजित बैठक के दौरान विषय प्रवेश सत्र में साप्ताहिक aअपनीहाट के मकसद का मसौदा प्रस्तुत किया था। इस मसौदे में गांव के बेरोजागारेां को रोजगार के अवसर, दूर की बाजार की आपा-धापी से निजात, अपनों के बीच अन्तर्सम्बन्धों का सृजन आदि होने वाले फायदे भी बताये थे। हाट के शुभारम्भ का उल्लास हाट में शिरकत करने वाले व्यवसाइयों के चेहरे में साफ दिखाई दे रहा था। पर आशंका बनी हुयी थी कि यह खुशी अपने सफर में कामयाबी की मंजिल तक पहुंचेगी या कुछ दूर चलकर विलुप्त हो जायेगी। इस पर शिल्पकार को कतई शक नहीं था। उन्हें इस काम पर पूरा भरोसा था कि यह प्रयास एक न एक दिन सुखद परिणाम ले कर आयेगा। जो गांव में खुशहाली का माध्यम और जरूरतमंदों की आजीविका का साधन बनेगा।
अपनीहाट के दिन “बागवान” की कोशिस होती थी कि गांव में पहुंच कर अपनी हाट के ब्यवसाइयों की कुशल-क्षेम ज़रूर पूंछें। साथ में वहीं से अपने परिवार की जरूरत वाली सब्जियां, मशाले और वस्तुएं भी खरीदें। इस मुहिम में महिलाओं को प्रेरित कर घर से हाट के मैदान तक पहुँचाने का सतत प्रयास मातृभूमि विकास संगठन से जुड़ी मंजू चौरसिया और नीलम श्रीवास्तव द्वारा अनवरत चलता रहा । आज अपनीहाट में महिलाओं और बालिकाओं की व्यवसायिक भागीदारी के साथ खरीददारी का अपना एक स्थान है।
अपनीहाट को प्रोत्साहित करने के लिए समय-समय पर कई जुमलों का भी प्रयोग किया जाता रहा है । जैसे किराया न पगड़ी-अपनीहाट डगरी। गांव का पैसा गांव में । सबके साथ अपना विकास। हाट में आओ फायदा कमाओं। क्रेता-विक्रेता हम सब एक, काम है एक,फायदे अनेक। घर बैठे हो कारोबार-गांव की अपनी हाट जुगाड़ । इन अन्यान्य प्रेरक शाब्दिक नारों ने भी जरूरत मंदो के अन्दर सुसुप्त ऊर्जा को जागृत करने में मदद की। तभी तो आज सर्दी,गर्मी और बरसात के दौर से गुजरती हुयी अपने गांव की अपनीहाट ने गांव में बदलाव की तहरीर लिखी है। ब्यक्ति परिवार गांव, समाज और कृषि क्षेत्र में हो रहे बदलावों को महसूश करना जितना आसान है, उससे कहीं अधिक कठिन अपने बदलावों की व्याख्या। जो आम ग्रामीणों के लिए कतई असंभव है। उसके पीछे कुछ परम्परागत संस्कार भी हैं । गांव में अपने कर्ज और अपनी पूंजी को बताने में स्पष्टता का अभाव है। इसे अपनी जीवन-संगिनी से भी साझा करने वाले परिवारों की संख्या नगण्य है।

अपनीहाट की बढ़ती उम्र के बीते दिनों में जाने-अनजाने बदलावों का सिलसिला चलता रहा। इस दौर में कर्ज-कुपोषण, पढ़ाई लिखाई, शादी विवाह,लेन-देन, घर-व्यवहार,खेती-बारी सहित तमाम दायित्वों का निर्वहन होता आ रहा है । इन सबके पीछे एक आशा की किरण अपने गांव की अपनी हाट की अहम् भूमिका हैं ।गांव के टूटे-बिखरे बेरोजगारी से तंग-अपंग परिवारों के लिए अपनीहाट न केवल बैशाखी बन कर खड़ी हुई बल्कि आगे चल पड़ने की हिम्मत और बढ़ते रहने की दृष्टि भी दी । छोटी-छोटी जरूरतों के लिए हैरान-परेशान परिवारों को अपनी जरूरत की वस्तुएं मिलने में आसानी और बचत हुयी। जिनके अध्ययन से पता चलता है कि गांव के सभी परिवारों ने लाखों रू. की बचत हासिल की है। गांव में खेती बारी और पशु पालन से मिलने वाले परोक्ष अपरोक्ष फायदों का हिसाब-किताब रखने की आदत नहीं होती। फायदे होते हैं, और घाटे&मुनाफे के दौर से भी अक्सर गुजरना पड़ता है। कस्बे और शहर के व्यवसाइयों को पता होता है]अपने धन्घे की लागत, उसमें होने वाले फायदों का। यही वजह है कि आज के बाजारू दौर में-खर्चने और बचाने के साथ कमाने की गणित के बिना खुशहाल रहना आसान नही है।
सबसे अहम बात यह है कि गांव से बाहर जाने वाला पैसा गांव में रूकने के लिए विवश हुआ। हर हाथ को काम, हर हाथ को बचत के अवसर लिए सामने खडा अपनीहाट का मैदान निशुल्क व्यवसायिक प्रशिक्षण केन्द्र बन गया। अपनीहाट कभी असहायों की सहायता के रूप में तो कभी महिला सशक्तीकरण के रूप में दिखाई देती नजर आयी। वहीं अपनी हाट बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का माध्यम बनी। तो कहीं जरूरत की पठन-पाठन सामग्री का जरिया । गांव से पलायन कर गये परिवारों की वापिसी का साधन बनने वाली हाट ने किसानों को कृषि फसलों में बदलावों के लिए प्रेरित भी किया । सामाजिक चेतना और आपसी सौहार्द के लिए केन्द्र बिन्दु बनी अपनीहाट ने गांव के वाशिन्दों को अपने चहुंमुखी विकास के लिए सुअवसर प्रदान किए । साप्ताहिक अपनीहाट को गांव में होने वाले साप्ताहिक उत्सव की संज्ञा दिया जाना कतई अनुचित नहीं होगा। निराश और अकेला पन की जिन्दगी वसर कर रहे बयोवृद्ध पुरूषों व महिलाओं के लिए अपनी हाट सुखद माहौल से ओत-प्रोत वृद्ध सेवा सदन के विकल्प के रूप में खडी हुयी है। अपनी हाट के वातावरण निर्माण में संयुक्त वन प्रबन्ध समिति, गांव के वाशिन्दों, किसान उत्पादकों, महिलाओं और युवाओं के साथ बच्चों का अतुलनीय योगदान शामिल है। जिन्होंने अपनी हाट में कभी व्यवसायी तो कभी खरीददार और कभी दर्शक बनकर हमेशा एक दूसरे को सम्बल प्रदान करते आ रहें हैं। अपनीहाट की पृष्ठभूमि में महोबा जनपद के तत्कालीन प्रभागीयवनाधिकारी/डी0एम0यू0अधिकारी श्री रामराजगौतम प्रभागीय व नाधिकारी/डी0एम0यू0अधिकारी श्री रमेशचन्द्र सहित तत्कालीन ए0डी0एम0यू0अधिकारी श्री विनोदशंकर शुक्ला एवं वर्तमान में कार्यरत ए0डी0एम0यू0अधिकारी श्री रामेश्वर तिवारी के प्रोत्साहन और मार्गदर्शन की अहम भूमिका है।
जायका परियोजना के अन्तर्गत अपनी हाट जैसी व्यवहारिक गतिविधियों का सम्मान जनक स्थान होना आवश्यक था। परियोजना में तय शुदा सीमाओं के चलते इस प्रयास को उचित सम्मान और प्रोत्साहन मिल पाने का प्रादुर्भाव रहा । परियोजना से सम्बधित अधिकारियों द्वारा प्राप्त सम्बल,प्रोत्साहन अपनी हाट के क्रमबद्ध विकास में शामिल अवश्य है । पर अपनी हाट कभी परियोजना के उद्देश्य, निर्धनता उन्मूलन और वन प्रबन्धन की माध्यम भी बन सकती है इस भरोसे को स्थापित कर सकने में मातृभूमि विकास संस्थान को अभी भी मीलो का सफर तय करना बाकी है।
अपनी गांव की अनगढ़ अपनीहाट के समुचित प्रबन्धन और उत्पादकों के प्रोत्साहन व उत्पादन की गुणवत्ता पर काम करने वृहद गुंजाइश है। इस दिशा पर काम हुआ तो जायका परियोजना के इतिहास में ग्रामीण विकास की एक नयी इबारत लिखने का सुवअवसर मिल सकेगा ।

(पुष्पेन्द्र भाई)

ग्राम स्वराज्य प्रहरी प्रशिक्षण संस्थान

अपनीहाट की प्रमुख उपलब्धियां
1. सामाजिक समरसता
2. महिला सशक्तीकरण
3. ब्यवसायिक प्रशिक्षण
4. मूल्य संबर्द्धन का जरिया
5. असहायों की सहायता
6. कुपोषण से मुक्ति
7. पलायन में कमी
8. कृषि में बदलाव
9. शिक्षा का संचार
10. वन पर निर्भरता में कमी
11. रोजगार सृजन

अपने गाँव की अपनीहाट
सामाजिक समरसता
गाँव की अपनीहाट की आहट से सामाजिक समरसता की अन्तर्मुखी आवाज सुनाई देने लगी है। इधर के दो- तीन दशकों में राजनीति के जातीय विद्वेश ने गांव के पारिवारिक ताने- बाने को उधेड़ कर उलझा दिया है । जिससे आपसी प्रेम-भाई चारा के वातावरण में प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। परिवारों की सांझी रसोइयां जमाने की बात हो गई है ।घर के आंगन के बीच कई दीवारें खडी हो गई हैं। जाडों में दरवाजे पर कौडों के रिवाज और चौपालों के ठहाकों का युग ही जाता रहा । किसान और श्रमिक के बीच रिस्तों की मिठास, बैलों की जोडि़यों के गले की घंटियां, चरवाहों के लमटेरा सब कुछ न जाने कहां खो गये । गांव की मिट्टी का सोधापन,तीज त्यौहारों की खुशियां औपचारिकताओं में बदल गयी हैं। ऐसे माहौल में गांव के परिवारेां को एक स्थान पर लाकर खड़ा करना आसमान से तारे तोड़ने की कोशिश से कम नहीं। जबकि ग्राम सभा की बैठकों का कोरम वास्ताविकता में शायद ही कहीं-किसी गांव में कभी पूरा होता हो। इस बात का प्रमाण गांव-गांव में बने पंचायत भवन की लम्बाई, चौड़ाई और गांव सभा के सदस्यों की संख्या को देखकर आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। इन सभी परिस्थितियों के बीच गांव में अपनीहाट की शुरूवात टूटे रिश्तों को पुर्नजीवन देने की व्यवहारिक पहल है।
इस बात के प्रमाण आज भी मौजूद हैं।गांव के दर्जी, नाई,कुम्भकार,बुनकर,लोहार,बढई आदि जैसे व्यवसाइयों व सेवा प्रदाताओं के मध्य कोई स्थाई कटुता नहीं है। न ही इनके रिश्तों में गांव के अन्य परिवारों से खटास । व्यवसाय और सेवा कार्य का सिद्धान्त भी इसी समरसता के आधार बिन्दु पर टिका है। इसी परम्परा के माध्यम को आधार समझकर अपनीहाट की पहल ने गांव-पड़ोस के परिवारों के बीच पनप रही कडुआहट को मिठास में बदलने की शुरूवात की है। हर सप्ताह अपनीहाट में गांव के बच्चे, बुजुर्ग, युवा, नौजवान, महिला, पुरूष बिना रोंक-टोंक और भेद-भाव के जरुरत की वस्तुओं का लेन-देन करते नजर आ रहे हैं।
खरीद-फरोख्त करते समय एक दूसरे के बीच उम्र और रिश्तों को दृष्टि में रखकर सम्बोधन, हंसी, मसखरी,मजाक के बोल भी सुनाई देते हैं। कहीं-कहीं वस्तु के मूल्य का पता भी नही होता। देने वाला कुछ भी नहीं पाने और लेने वाला अधिक से अधिक देने की जोर आजमाइस करता नजर आता है। वहीं जिनके बटुवे में कुछ भी नहीं होता, वह भी हाट सिमटने पर अंगौछे के छोर में सब्जी की पोटली बांधे घर जा रहे होते हैं। कुछ तो लम्बी स्योंर,पढिन, रेहू मछली भी बिना दाम ही पा जाते है।
इधर के बीते दो वर्षो में गांव के तीज-त्योहारों, शादी - विवाहों में रोचकता दिखने लगी है। शादियों के भेाज में गांव की बेलनहारिनों के गीत, और बड़े कड़ाहों को सम्भालने वालों से लेकर भोजन परोसने वाले गांव के अवैतनिक सहयोगी ही नजर आ रहे है। अपनीहाट के इस सिलसिले से गाँव में आपसी भाईचारा का सृजन, परिवारों की उन्नति, सम्रृंद्धि का मार्ग प्रसस्त हो रहा है ।
महिला सशक्तीकरण -
अपनीहाट के प्रारम्भिक दौर में अपनीहाट पर बच्चे, कुछ महिलाएं, जिनमें अधिकांश पुरूष ही थे। पर धीरे-धीरे बच्चों के साथ महिलाओं ने व्यवसाइयों का स्थान ले लिया। आज अपनीहाट में महिलाओं,लड़कियों की संख्या की बाहुल्यता दिखने लगी हैं ऐसा नही है कि वह व्यवसाय में पीछे हैं। महिलाएं अपने व्यवसाय को पूरे मनोयोग-विनम्रता और उदारता के साथ करती दिख रही है। जो महिलाएं पहले की अपनीहाटों में अपनी जरूरत की वस्तुओं की खरीददारी करने घूंघट डालकर आती थीं। तस्वीर लेने के लिए बड़ी कोशिस के बाद उनमें समझ बनती थी । उन्हीं में कुछ महिलाएं आज हाट में व्यवसाय सम्हाल रही हैं।
कुछ तो अपनी खेती में फसलों का चयन और अधिक फायदे वाली फसलों को करनें कि समझ भी रखती हैं ।परिवार में निर्णय की भूमिका में बराबर का योगदान कर रही हैं। इस बदलाव के पीछे महज अपनी हाट का सामाजिक प्रभाव ही है।
व्यवसायिक प्रशिक्षण -
बेरोजगारों,युवाओ,महिलाओं को रोजगार परख बनाने के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों में बड़ा निवेश कर प्रशिक्षित करने की सरकारी परम्परा है। जिसमें शिक्षा, और उम्र के साथ जातीय श्रेणी आदि की अनिवार्यता है। उन केन्द्रों में जनसंख्या के अनुपात में देखा जाय तो 0.5 प्रतिशत वाशिन्दों को भी यह प्रशिक्षण नही मिल पा रहा। कुल प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं में से वमुश्किल 5 प्रतिशत ही अपना रोजगार खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ पाते हैं। व्यवसायिक पेचींदगी,बैंकलोन, विविध लाइसेंन्स प्रणाली, कच्चा माल, बाजार की उपलब्धता जैसी अन्न्यांन्य समस्यायें उन्हें आगे बढ़ने में बाधक हैं। इसका उदाहरण बुन्देलखण्ड में देखा जा सकता है। जहां सर्वाधिक नगरों में आज भी औद्योगिक गतिविधियां शून्य है। इसके लिए आरक्षित भूमि, प्लाट या तो विक्रय पूरे नहीं हुये। जो हुए भी हैं वह आज भी उद्योग रहित हैं।
वहीं गांव में स्थापित हुई अपनीहाट परिसर में देखते ही देखते पूरा मैदान- व्यवसायिक गतिविधियों से भरा पूरा दिखाई देता है। गांव के उत्पादक, गांव के विक्रेता, गांव के खरीददार इन सब के बीच, उम्र, शिक्षा,श्रेणी, और प्रशिक्षण की कोई बाध्यता नहीं। और न ही घाटे का व्यवसाय । इस हाट में सभी को फायदा होता है।उत्पादक-उपभोक्ता के मध्य सम्बन्ध और व्यवहार होता है। लेन- देन मे तृप्ति का भाव होता है। जो बाजार में तो कतई सम्भव ही नहीं ।
अपनीहाट में काम के साथ स्व-अनुभव पूर्ण प्रशिक्षण परिवार के बुजुर्गों के मार्गदर्शन में होता है। इस प्रशिक्षण केन्द्र में न तो वैतनिक प्रशिक्षक न ही चयनित प्रशिक्षणार्थी,और न ही उसका प्रमाण पत्र । जो भी होता है वह सब पारम्परिक पारिवारिक अनुभवों ओैर रिश्तों के तारतम्य में दायित्व निर्वहन की कसौटी पर चलता है। वर्तमान परिवेश में गांव के उन युवाओं, युवतियों और कठिन दौर से गुजर रहे बेरोजगारों के लिए गांव की अपनीहाट किसी व्यवस्थित व्यवसायिक प्रशिक्षण केन्द्र से कम नही है। जिसके संचालित होते ही प्रशिक्षण-स्वरोजगार और पोषण के साधन मिलने की शुरुवात हो जाती है।
मूल्य सम्बर्धन - गांव के उत्पादकों को प्रायः इसलिए कृषि उत्पाद में शिकस्त मिल रही है। क्योंकि उन्हें अपने उत्पाद का उचित बाजार और समुचित दाम नहीं मिल पाता । वहीं उस उत्पाद से जुड़े पांच-दस प्रतिशत आमदनी पर निर्भर आढ़तिया, और फुटकर विक्रेता मालामाल है। अनाज, सब्जी, दूध और फल, गन्ना उत्पादकों की हालातें नही सुधर पाने, उन पर कर्ज का बोझ बढने की मूल वजह भी यही है। जिसका समाधान गांव की अपनी हाट के माध्यम से मिलने की प्रबल सम्भावना बनी है।
उपभोक्ताओं को 20 रूपये प्रति किलों की दर से मिलने वाली हरी सब्जियों का उत्पादक किसान को मण्डी में 8-10 रू0 किलों का ही मूल्य मिल पाता हैं ।शेष 10-12 रूपये प्रति किलो का मुनाफा आढ़तिया और फुटकर विक्रेताओं के पास जाता है। उत्पादकों पर नकेल डाले रहने के लिए आढ़तिया- बाहर की मण्डियों से मांग- आपूर्ति के बीच संतुलन- असंतुलन बनाये रखने में माहिर होते हैं। जो कभी स्थानीय उत्पादक को उनके मुंह मांगी कीमत के दाम की नौबत ही नहीं आने देते । वर्ष में हर फसल का एक ऐसा दौर भी आता है जब बाहरी आउक के चलते कभी-कभी कई उत्पादों को मंडी तक लाने के बाद जब मजदूरी और भाड़ा भी नहीं मिलता। तब उत्पादक अपने उत्पाद को रोड में फेंक कर जाने के लिए मजबूर होता है। ऐसे वक्त पर किसान उत्पादक निराशा के दौर से गुजरता है।
अपनीहाट में उत्पादक को अपने उत्पाद का सन्तोषजनक मूल्य मिलता है। गांव में होने के कारण जब भी मंदी का दौर होता है। तबउत्पादक अपने सुपरिचित परिवारों को भेंटकर पारिवारिक-सामाजिक रिश्तों को मजबूत कर अपने उपभोक्ता के साथ व्यवहार करता है। अपनी हाट में उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सम्बन्धों की परम्परा होती है। उत्पादक बाजार मूल्य से 10-- 20 प्रतिशत कम मूल्य पर अपने उपभोक्ताओं को अपना उत्पाद देकर भी पूरा मूल्य पाता है। वह सिर्फ मण्डी आने-जाने के भाड़े की रकम के समतुल्य ही समझौता कर बाजार में बिकने वाले फुटकर मूल्य को पा लेता है।
वहीं उपभोक्ता बाजार के फुटकर मूल्य से 10-20 प्रतिशत कम पाकर खुश होने के साथ बाजार आने-जाने के परिश्रम और भाडे़ की बचत देखता है। इस तरह उत्पादक अपने उत्पाद का मूल्य सम्बर्धन कर अधिक आय प्राप्त करता है। यह मूल्य संबर्धन और ब्योहार पूर्ण तृप्ति का भाव अपने गाँव की अपनीहाट में ही संभव है ।
असहायों की सहायता -
अपनीहाट में गांव के उन असहाय परिवारों के लिए भी उचित स्थान है। जो किन्हीं कारणों से अपने पुत्रों के सपरिवार पलायन कर महानगर चले जाने से अकेले हो जाते हैं। अथवा जो शारीरिक रूप से कमजोर है या जिनके पास अपनी नगदी, पूंजी का अभाव होता है। वह जो कठिन परिश्रम कर मेहनत- मजदूरी से पैसा नहीं प्राप्त कर सकते । हाट के दिन वह घर से निकल कर अपनीहाट के मैदान आकर बैठते हैं। अक्सर हाट समापन में सब्जियां, फल आदि कुछ न कुछ विक्रय से बच जाते हैं। जिनका उपयोग उत्पादक-विक्रेता परिवार में हो पाना सम्भव नहीं होता । रात भर रखने से खराब होने की आशंका होती है ।ऐसे में बड़े सम्मान पूर्वक दादा - बब्बा चाचा, चाची के सम्बोधन से पुकार कर सब्जियाँ और फल देकर स्वयं को धन्य मानते है। ये परम्परा का हिस्सा भी है। हर कोई अपनी आमदनी का कुछ भाग जरूरत मन्दों को देकर पुण्य लाभ प्रप्त करने की लालसा रखता है। इसी लालसा से हर जरूरत मन्द की अपनी हाट के माध्यम से सहायता होती दिख रही है।
कुपोषण से मुक्ति-
गांव का उत्पाद जब शहर और कस्बे की राह पकड़ता है। तो गांव के परिवारों की जरूरत और हिस्से का उत्पाद भी नहीं बचता । गांव के दूध ने शहरों की राह पकड़ी तो गांव में उन घरों पर भी घी, मट्ठा और दूध का अभाव हो जाता है। जिनके घर 4-6 दुधारू जानवर हैं। वह भी कुपोषण का शिकार है । इसके पीछे व्यापार का द्रष्टिकोंण होता है। पशु के पोषण में खर्च होने वाली कीमत - बचत की गणित चलती है। साधन सम्पन्न परिवारों में भी पोषण युक्त भोजन का अभाव इसके गवाह हैं।
वही जब गांव का उत्पाद गांव के परिवारों के बीच सामान्य श्रम-समय और संसाधनों की जरूरत पर लेने-देन का जरिया बनता है। तो किसी न किसी रूप में सभी तक पहुंचता है। गांव में जब घी विक्रय की शुरूवात होती है। तो मट्ठा जैसे पोषक उत्पाद की आपूर्ति सभी परिवारों तक निशुल्क पहुंचती है। अपनी हाट में गांव की हरी सब्जियां ,भाजी, फल, आदि सभी की आसान पहुंच के दायरे में होते है। सभी तक पर्याप्त पहुंचते है। ऐसी स्थिति में पोषण की आपूर्ति के सामने कुपोषण पलायन करता है। इन गांवों में कुपोषण कम होने और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती दिख रही है अपनी हाट ।
पलायन में कमी-
बुन्देलखण्ड के गांवों में सूखा,ओला, अतिवृष्टि से फसलों के नुकसान होने के कारण एक दशक से पलायन में इजाफा हुआ है। कोई गांव ऐसा नहीं है। जहां से रेाजगार की तलाश में परिवारों के युवाओं, महिलाओं, का पलायन नहीं हुआ हो। महोबा जनपद में इसका प्रभाव कुछ अन्य जिलों से अधिक ही है।
गांव में अपनीहाट की स्थापना के एक दो वर्ष चलने के बाद पलायन कर गये युवाओं को ऐसा महसूस हो रहा है। कि गांव की हाट के सहारे अपनी रोजी-रोटी का सहारा पा सकते हैं। कई ऐसे परिवार जिनका महानगरों की ओर पलायन कर रोजी-रोटी की तलाश में जाना तय था। उनकी दृष्टि में बदलाव अपनीहाट से आया है। और इस हाट में अपनी दुकान लगाकर अपनी जरूरत पूरी कर रहे है। गांव में कई परिवार जो मजदूरी के लिए प्रतिदिन शहर जाते थे। वह हाट के दिन खुद का व्यवसाय करते है। कुछ युवा जो रोज दूर-दराज के गांवों में फेरी कर व्यवसाय करते थे। वह हाट के दिन तो गांव में ही रहते है। अब हप्ते में दो तीन दिन अपने गांव और पड़ोसी गांव में कुछ समय के लिए फेरी करते देखे जा सकते हैं। अपनीहाट यहाँ के पलायन कर गये परिवारों की वापिसी का जरिया बन रही है।
कुछ ऐसे भी परिवार हैं जो कई सालों से पंजाब, हरियाणा, ईट-भट्ठो में काम करने के लिए सपरिवार, पलायन कर अक्टूबर से मई-जून तक रहते है। जून में ही वापस आकर सितम्बर तक गांव में रूकते है। उन्हें हर साल अपने श्रमिक प्रदाता ठेकेदार से बरसात में पेशगी लेकर खाना- खुराक चलानी पडती है।
ये सिलसिला 15-20 सालों से चल रहा है। थमने का नाम ही नहीं लेता । इस साल ईट भट्ठा में काम कर वापस आने वाले कुछ श्रमिकों ने आते ही अपनी चार पहिया की ठेलिया पर थेाक में खरीदी सब्जियों को अपनी हाट में बिक्री के लिए रखा है। ये प्रयास है कि अबकी साल चार माह में हम अपनीहाट से व्यवसाय कर परिवार की जरूरत पूरी करेंगें। उनका मानना है कि इस साल हमें अपने ठेकेदार से पेशगी लेने की जरूरत नहीं होगी। न ही ईट भट्ठे पर जाने की मजबूरी । हालांकि अभी तो महज अपने रोज मर्रा की जरूरत पूरी करने की पहल हैं। इस तरह से अपनी हाट की स्थापना ने गांव के बढते पलायन पर अंकुश लगाने के साथ वापसी का साधन भी बन रही है।

कृषि में बदलाव-
महोबा जनपद में पानी की कमी और भूगर्भ-जल के गिरने से खेती का बडा भू-भाग वर्षा के अधीन है। भूसा-चारे के अभाव से बहुधा पशु छुट्टा रहने के लिए विवश है । यही वजह है कि किसान चाहकर भी अपनी जमीन पर फायदे वाली नगदी फसलों के उत्पादन को नहीं अपनाता । दूसरा बड़ा कारण है कि किसी भी एक खेत [एरिया] में एक तरह की फसलों के उत्पादन की सहमति का अभाव रहता है। इस अभाव के पीछे आपसी मनमुटाव, सम्वादहीनता, उत्पादन का मूल्य नहीं मिलने की आशंका भी है। तभी तो इस क्षेत्र की कृषि फसलों में विविधता नगण्य हो गयी है।
अब यहां का किसान, मटर, चना, मसूर और कुछ इलाकों में तिल मूंगफली की सामान्यतः फसलें बोता है। गेहूँ का उत्पादन घटा है। खरीफ की फसलों में ज्वार,बाजरा, अरहर,लोबिया, मक्का, मूंग का उत्पादन जमाने की बात है।
अपनीहाट ने किसानों को एक दृष्टि दी है। इसी दृष्टि के बनते -किसानों ने अपनी कृषि में बदलाव कर सब्जियां, गन्ना,तरबूज, खरबूजा, साग- भाजी जैसे उत्पादों को स्थान देकर सघन रूप में प्रारम्भ किया है। अपनी हाट इनके लिए आशा की किरण और प्रेरणा का माध्यम हैं। उन किसानों के अन्दर अपने उत्पादन का उचित मूल्य मिलने की सम्भावना का भरोसा हुआ है। इस बदलाव की गति और प्रभाव सामान्यतः बिना गहरे अध्ययन के मापा नहीं जा सकता।
पर प्रारम्भिक दौर से अब तक का अपनी हाट का सफर उसके मुसाफिरों की संख्या ,उनका स्व संचालन, जरूरत के उत्पादों का सभी मौसम में बने रहना, खेतों में ग्रीष्म ऋतु पर किसानों की चहल कदमी, ताजी हरी सब्जियां, पानी के उपाय करते किसान,किसी प्रमाण के कायल नहीं हैं। इन सबकों देखकर यह कहना अब गलत नहीं होगा कि अपनी हाट कृषि में बदलाव की सम्भावना लेकर गांव में प्रकट हुई है।
शिक्षा का संचार-
अपनीहाट ने गांव के परिवारेां में शिक्षा के प्रति उन्हें संवेदित करने का अनूठा काम किया है। गांव के परिवारों की निर्भरता कृषि पर ज्यादा है। कृषि में कई वर्षो से हो रहे नुकसान से परिवारों को अपने रोज-मर्रा में खर्चे चला पाना मुश्किल था। ज्यादातर परिवारों के मुखिया नजदीकी शहर कुछ मनरेगा, कुछ महानगरों की ओर मुखातिब थे।
बच्चों की छोटी-मोटी जरूरतें भी समय पर पूरी करना सम्भव नहीं हो तो घर पर महिलाओं, बच्चों में अभाव के चलते चिड़चिड़ापन होना स्वाभाविक है। उन्हें स्वयं नहीं पता था कि हमें क्या हो रहा है। बच्चे स्कूल की बजाय खेलने- कूदने कुछ शरारत करने की दिशा में बढ़ रहे थे।
बहुतों को तो श्री, गुटका, और बीड़ी सिगरेट की आदतें भी आ पड़ी थीं । इधर अपनीहाट में ब्यवसाय की सम्भावनाओं का जन्म हुआ। महिलाओं को अपने हांथ में बचत आने की आशा ने उन्हें व्यवसायी और अपनी जरूरत पूरी करने का रास्ता दिखाया। घर पर जरूरत की वस्तुएं,उचित खान- पान जरूरत के कपड़े और हांथ में कुछ बचत अभावों के सिमटने के साथ बच्चों की शिक्षा के प्रति संवेदना जागृत होने से बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजना माताओं ने गौरव समझा।
बच्चों को स्कूल जाने को प्रेरित, प्रोत्साहित करने वाली वस्तुओं को दे पाने की क्षमता अपनी हाट के साथ निर्माण हुई। वहीं बच्चें हाट के दिन अपने स्कूल की छुट्टी के बाद अपनी दुकान सम्भालते हैं। अपनी हाट शिक्षा के संचार का माध्यम बनेगी ये बात पहले सोचा भी नही था।
वन पर निर्भरता में कमी--गांवों में बेरोजगारी और रोटी के संकट के चलते ग्रामीणों को अपने नजदीक जो भी आय के श्रोत और संसाधन नजर आते हैं। वह उनके उपभोग का भरपूर प्रयत्न करते हैं। रोटी,कपड़ा, मकान, की मूल भूत जरूरतों में से लकड़ी ग्रामीण जीवन की सर्वाधिक जरूरत वाली वस्तु है। कृषि यंत्रों, भवन निर्माण.भोजन निर्माण, शयन वस्तुओं, दाह संस्कारों, सहित विवाह जैसे संस्कारों में भी लकड़ी ईधन की जरूरत है। लकड़ी का उपयोग मनुष्य के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक होती है। गांव में रहकर बाजार से लकड़ी खरीदना तभी सम्भव है। जब पहुंच से बाहर वन और खरीदने की क्षमताएं मौजूद हों। हुआ भी यही कि जंगल के निकटवर्ती गांवो में जहां चकबन्दी प्रारम्भ-सम्पन्न हुई,वहां वनों पर अधिक दबाव बना। इस दो तीन दशक में कृषि पर यन्त्रों का दबाव और पानी के संकट से जमीन और बेजमीन वाले कृषक श्रमिक परिवारों में दूरी पैदा हुई। जिससे वस्तु विनिमय की परम्परा ही समाप्त हो गयी। ऐसे में ज्यादातर श्रमिक परिवारों की रोटी-रोजगार के लिए ईधन की लकड़ी काटकर बेचने का रास्ता सरल दिखा। जबकि इस काम से उन्हें कोई सन्तुष्टि जैसी चीज नहीं मिली। पेट के लिए उपेक्षित होकर लकड़ी बेचना समझौता था नाकि स्वाभिमान सहित स्वरोजगार।
अपनी हाट मे उन परिवारों को अपनी जरूरत पूरी करने का रास्ता दिखा। कुछ बहुत कम पूंजी से, कुछ तो बिना पूंजी के भी गांव में किसानों से वस्तुएं लेकर हाट में बैठे और शाम को उनकी पूंजी वापस की । रोटी का जुगाड़ होते ही उन्हें अपने चूल्हे मात्र के लिए ही लकडी की जरुरत थी। बेचने के लिए नहीं । कुछ किसानों ने अपने खेत में उद्यानीकरण करने की पहल से प्रेरित होकर वृक्षारोपण भी किया। और वन से अपनी निर्भरता को लगभग कम किया। जिनके हाँथ में रोटी-रोजगार का जरिया हाँथ लग गया वह जिल्लत भरे काम से तौबा कर चुके हैं।
रोजगार सृजन-
अपनीहाट से परोक्ष अपरोक्ष रूप से गांव के सभी परिवारों को फायदे पहुंचे है। गांव में एक चौथाई परिवारों ने अपनीहाट में अपनी दुकान लगाकर आय सृजन किया। वहीं इतने ही परिवारों ने बेहतर उत्पादन कर बेहतर मूल्य प्राप्त किया । तथा गांव में शेष परिवारों को बाजार से कम कीमत पर श्रम-समय औऱ ब्यय किये बिना जांची, परखी,अच्छी वस्तुएं मिलीं ।जिनसे किसी न किसी रूप में गांव का प्रत्येक परिवार लाभान्वित हुआ और बचत की। इन सबका मूल्यांकन करने से पता चलता है कि अपनी हाट से गांव के परिवारेां को मिलने वाली आय और बचत ने मौसम और कृषि उत्पादन की तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी रोटी-रोजगार को बनाए रखा। पानी में डूबते को तिनके का सहारा की कहावत इन गांवों में चरितार्थ होते दिख रही है। इस कठिन दौर में भी अपेछाकृत गांवों के परिवारों को पलायन करने से रोककर रखा। अपनीहाट से गठित रिस्तों के चलते- मजबूत होते सम्बन्धों ने एक दूसरे को साहस और धैर्य की क्षमता प्रदान की । तमाम बाधाओं,कर्जों को सहजता से निपटाने,पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने का साहस दिया। उन्हें क्षेत्र के अन्य किसानों की तरह निराशा की हद पार करने से रोका ही नहीं, बल्कि उन्हें आत्म हत्या जैसी परिस्थिति तक पहुंचने ही नहीं दिया।
इस सब के पीछे घोर अंधकार के मध्य अपनी हाट का टिमटिमाता दीया ही था। जो तमाम आंधियों,तूफानों के चलते बुझा नहीं सदा अपने प्रकाश से आगे बढ़ने का रास्ता प्रसस्त करता रहा।
अपनीहाट से नकदी और वस्तु की बचत के साथ समय, भाडा,किराया,झगड़ों में होने वाले अपब्यय,कुपोषण से होने वाली बीमारियों पर खर्चों की बचत जैसे अन्न्यान फायदे हुए हैं ।
अपनीहाट के आंतरिक और बाह्ह्य विविध बदलावों को देखा जा सकता है। अपनीहाट के दिन ग्रामोत्सव जैसा माहौल बुजुर्ग,बच्चों,महिलाओ के लिए उल्लास पूर्ण होता है जिसे वह याद रखते हैं। और उस दिन हाट के मैदान तक सभी आने की कोशिश करते हैं। जिसका प्रभाव उनके स्वास्थ्य की अनुकूलता के हित सम्यक होकर पारिवारिक खुशहाली के लिए फायदेमंद बना है ।



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आंकड़े सच कहते हैं-
अपनी हाट के अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अपनी हाट में उपलब्ध प्रमुख उत्पाद जिन्हें उपस्थित पाया गया है। वह गांव के 400 परिवारों के लिए औसतन कितनी मात्रा और पूंजी की रोजाना/ मासिक/ वार्षिक जरूरत बताते हैं। यह मांग और आपूर्ति गांव के 50 परिवारों से सामान्य पूंछताछ पर आधारित है। जिन्हें पृष्ठ क्रमांक 2-8 में देख सकते हैं। पृष्ठ क्रमांक 9 पर सब्जी व्यवसाय की बचत तालिका औसतन शु़द्ध बचत को दर्शाती है। पृष्ठ क्रमांक 10-12 में अपनी हाट और मंडी पर थोक सब्जी विक्रय से सम्बधित आंकड़े बताते हैं कि उत्पादक, उपभोक्ता, विक्रेता के मध्य बचत का संतुलन और अन्तर कितना है। पृष्ठ क्रमांक 13-16 अपनी हाट के सब्जी व्यवसाय से प्राप्त बचत और मनरेगा की मजदूरी का तुलनात्मक अध्ययन स्पष्ट है। पृष्ठ क्रंमाक 17-19 अपनी हाट के ब्यवसायी शेख सहादत परिवार के चार सदस्यों को प्राप्त रोजगार के अवसर, बिक्री व बचत की दास्तान है।

सालट गाँव की अपनी हाट में उपलब्ध विक्रय सामग्री एवं गाँव के 400 परिवारों की आवश्यकताएं
{गाँव के 50 परिवारों के अध्ययन अनुसार}

क्रम

क्रम उत्पाद / सामग्री औसतन प्रति परिवार एक दिन की जरुरत
kg/rs. प्रति परिवार मासिक जरुरत
kg/rs. औसतन प्रति परिवार जरुरत
kg/rs. प्रति परिवार औसतन वार्षिक ब्यय 400 परिवारों पर औसतन वार्षिक ब्यय
1 सब्जियां 1.5 kg 45 kg 540 kg 540×20= 10800.00 43,20,000.00
2 मशाले 3.22 रुपए 96.6 रुपए 1159.2 1159.2 4,63,680.00
3 गुड 0.05kg 1,5 kg 18kg 18×25 =450 रुपए 1,80,000.00
4 गन्ना 0.15 4.75 रुपए 57.00 57.00 22,800.00
5 फल 1.83 रुपए 55.00 रुपए 660.00 660.00 2,64,000.00
6 अंडे 0.2 अदद 6 अदद 72 अदद 72 ×5 =360 रुपए 1,44,000.00
7 मछली 0.03kg 1 kg 12 kg 12×80 =960 रुपए 3,84,000.00
8 चाट समोसे 77.5 930.00 930.00 930.00 3,72,000.00
9 मिठाइयाँ 2.66 रुपए 80.00 960.00 960.00 3,84,000.00
10 प्रसाधन सा0 /चूड़ियाँ 2.5 रुपए 75.00 900.00 900.00 3,60,000.00
11 रेडीमेट कपडे 4.16 रुपए 125.00 1500.00 1,500.00 6,00,000.00
12 विसात खाना 0.58 रुपए 17.5 रुपए 210.00 210.00 84,000.00
13 मिटटी एवं बॉस के बर्तन आदि 1.00 30.00 360.00 360.00 1,44,000.00
योग - 77,22,480.00

सालट गाँव की अपनी हाट में उपलब्ध सब्जियों की आवश्यकता का अध्ययन
{गाँव के 50 परिवारों के अध्ययन अनुसार}
उत्पाद सामग्री अध्ययन में शामिल परिवारों की संख्या प्रति परिवार की रोजाना खपत किलोग्राम

कुल खपत कि0ग्रा0 रूपया औसतन प्रति परिवार की रोजाना खपत

1. सब्जियां 12 2 किग्रा0 24 किग्रा0 1.5 किलोग्राम प्रतिदिन
09 2.5 किग्रा0 22.5 किग्रा0
18 1 किग्रा0 18 किग्रा0
06 1.5 किग्रा0 09 किग्रा0
02 0.5 किग्रा0 01 किग्रा0
03 माह

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