15/09/2020
जननायक कर्पूरी ठाकुर के राजनीतिक शिष्य और समाजवाद के अंतिम स्तंभ थे डाॅ रघुवंश प्रसाद सिंह : डाॅ रुपक कुमार सिंह के कलम से ...
http://24republicbharat.com/1588/
जब डाॅ रघुवंश प्रसाद सिंह 2014 मे वैशाली लोकसभा का चुनाव हारे थे तो मैने एक आलेख लिखा था कि "लोग खुश है एनडीए के जीत पर और मै दुखी हूँ एक योग्य, इमानदार, सिद्धांतवादी और अंतिम समाजवादी नेता के हार पर। मोदी लहर के कारण एक विवादास्पद पृष्ठभूमि का व्यक्ति भले जीत गया हो पर रघुवंश नही हार सकता अगर कोई हारा है तो वह है सदन की आवाज, गांव गरीब का प्रतिनिधि, लोहिया-कर्पूरी का विचार और लोकतंत्र के अनुरूप कार्य करने वाला कर्तव्यनिष्ठ राजनेता।" काउंटिंग खत्म होता है रघुवंश समर्थक मायूस होकर निकलते है, रघुवंश बाबू एक करीबी के घर पर बैठे थे, हमेशा खैनी और पान खिलाने वाला समर्थक उनके पास मुंह लटकाकर पहुंचता है तो रघुवंश बाबू झट से बोले कि "मर्दे पनवा न खियाएगा का" जैसे पान आता है मुँह मे दबाकर चल देते है, न कोई शीकन, न किसी की आलोचना, न किसी से शिकायत। रघुवंश बाबू से वैशाली मे अनौपचारिक मुलाकात मे हमने पूछा दिल्ली मे आप कहाँ-कहाँ जाते है, तो जवाब मिलता है कि अपना सरकारी आवास, सदन, पार्टी कार्यालय, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन को छोड़ कर हमे कुछ नही देखा हुआ है। ऐसे ही मोहीउद्दीन नगर मे एक समारोह मे हमने देखा कि सब लोग चम्मच से तरह तरह के व्यंजन का स्वाद ले रहे थे और बगल मे बैठे रघुवंश बाबू दूध रोटी खा रहे थे। आज के युग मे कभी पार्टी व विचार न बदलने वाले एकमात्र राजनेता थे रघुवंश। हमे याद है UPA 2 मे कांग्रेस से राजद अलग हो गई, फिर भी रघुवंश बाबू को कांग्रेस ने लोकसभा का स्पीकर फिर कुछ दिन बाद डिप्टी स्पीकर बनाने की इच्छा जाहिर किया, इतना ही नही दुबारा ग्रामीण विकास मंत्री बनाने के लिए भी ऑफर मिला, पर इन्होने ठुकरा दिया, क्योंकि राजद ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था और ये राजद के प्रति निष्ठावान थे। जब ये सांसद हुआ करते थे तब पूरे बिहार मे बिजली की स्थिति काफी खराब थी पर वैशाली क्षेत्र मे 18 घंटे बिजली रहती थी, कारण सुरेश प्रभू केंद्रीय सरकार मे उर्जा मंत्री थे, रघुवंश बाबू ने बुद्ध महावीर की धरती रोशन हो इसके लिए 2600 गांव के लिए बिजली देने का आग्रह किया, सुरेश प्रभू ने तुरंत इस बजट को स्वीकृत कर दिया। हाजीपुर सुगौली भाया वैशाली रेलवे लाईन बनाने का प्रस्ताव इनका ही था जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी ने स्वीकृत कर लिया। जब ये ग्रामीण विकास मंत्री थे तब पूरे बिहार की ग्रामीण सड़को का सूरत बदल गया, इतने सड़क का निर्माण एक साथ हुआ कि चारो तरफ विकाश दिखने लगा, पर मुख्यमंत्री नीतीश जी थे इसलिए क्रेडिट नीतीश कुमार को ही मिल गया। पहले केन्द्र सरकार राज्यों के विकास के लिए जो पैकेज देती थी उसमें राज्यो को 30% राशि लगाना होता था, पर 100 फीसदी राशि केन्द्र सरकार राज्यो को देने लगी थी, इसका श्रेय इन्ही को जाता था। मोदी सरकार के आते ही पुनः 60% केन्द्र और 40% राज्य को विकाश कार्यो के लिए खर्च करना पड़ रहा है। जब ये केंद्र सरकार मे मंत्री थे तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने साक्षात्कार मे कहा था कि नरेगा/मनरेगा का कांसेप्ट डाॅ रघुवंश प्रसाद सिंह का है इसका क्रेडिट उन्हें मिलना चाहिए। उपयुक्त गुणों के अलावा वेबाक होकर अपनी बात रखने वाले इस नेता की तुलना बिहार ही नही बल्कि भारत के किसी भी राजनेता से करना बेईमानी होगी, दुर्भाग्य है कि ये जिस पार्टी मे रहे वह परिवारवाद और पुत्र मोह के कारण इनका कद्र करना भूल गया।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी जब भी रघुवंश बाबू को सदन मे देखते थे तो कहते हमारा Stalwart आ गया। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जी से सुना था कि रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता सदन की जरूरत है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि जी ने हमे बताया कि रघुवंश बाबू जब सांसद थे तब लोकसभा मे समय से जाना और पूरे कार्रवाही का हिस्सा बने रहना फिर समय से सदन से ही निकलते थे। इनको पार्लियामेन्ट्री ज्ञान बहुत था, हर विषय पर ये सदन मे अपना प्रश्न करते रहे है और बारीकी से अपना पक्ष भी रखते थे।
दो बार विधायक एक बार एमएलसी और सभापति, पांच बार सांसद, बिहार सरकार मे मंत्री के साथ केंद्र में एच डी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और मनमोहन सिंह के सरकार मे तीनो बार मंत्री रहे है।
जीवन के अंतिम क्षण जब ये जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे तब इन्होने एम्स, दिल्ली से वैशाली और बिहार से संबंधित कई महत्वपूर्ण छूटे कार्य को कराने के लिए मुख्यमंत्री और बड़े आला अधिकारी को पत्र लिखने के बाद सादे कागज पर लालू प्रसाद जी को यह लिखा कि जननायक कर्पूरी ठाकुर के बाद 32 साल तक आपके पीठ पीछे खड़ा रहा लेकिन अब नही...।
रघुवंश बाबू ने अंतिम समय मे पार्टी तो छोड़ा पर पार्टी नही बदला। लालू जी के पुत्र तेजप्रताप ने इनको "एक लोटा पानी" के बराबर समझा था, इसलिए रघुवंश बाबू का राजद से इस्तीफा देना सही निर्णय था, जहाँ सुनने वाला कोई नही हो, जहाँ सम्मान न मिले वहाँ एक पल भी नही रुकना चाहिए। रघुवंश बाबू आप "एक लोटा पानी" नही बल्कि "लालटेन के तेल" थे अब बिना तेल लालटेन नही जल सकता...।
आपका जाना राजनीति से इमानदार चरित्र का लुप्त हो जाना, समाजवादी युग का अंत हो जाना है। अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि, शत् वार नमन् । (डाॅ. रुपक कुमार)