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05/12/2023

समाज ने आज एक अनमोल हीरा खो दिया
नहीं रहे हैं #सुखदेव_सिंह_गोगामेड़ी
बहुत ही दुःखद घटना।
*विनम्र श्रद्धांजलि।*
🙏💐💐
#क्षत्रियों की लड़ाई लड़ने वाले अब हमारे बीच नहीं रहे।

29/09/2023
01/07/2022

कन्हैया लाल की हत्या के वक्त 8-9 लोगो मे एक भी कर्म से क्षत्रिय नही बना, क्षत्रिय वही बना जो जन्म से क्षत्रिय था। अब समझ गए क्षत्रिय कर्म से नही जन्म से होता है।

्षात्रधर्म

26/05/2021

सुशील कुमार को बचाने के लिए सभी पार्टियों के सारे बड़े जाट नेता एकजुट हो गए हैं. खाप पंचायत सक्रिय हो गई हैं. जबकि मरने वाला भी जाट है. इसके परिवार वालो से सेटलमेंट के लिए दसियों करोड़ देने कि बात चल रहीं हैं. गैंगस्टर लोग भी जुड़े हुए हैं तो उन्हें भी समाज द्वारा मैनेज किया जा रहा है. पुलिस तो मैनेजड है ही. मीडिया भी कुछ दिन के लिए मैनेज कि थी, दोबारा हो जाएगी. 99% उम्मीद है कि सुशील कुमार को कोई सजा नहीं होगी.

यहां चौड़े में हत्या करने पर भी पूरा समाज बंदे को बचा ले जा रहा है जबकि एक क्षत्रिय सेलिब्रिटी कि हत्या पर दुनिया भर के सामने 24 घंटे कि मीडिया कवरेज के बावजूद एक सरकार द्वारा खुलेआम अपराधियो को बचाने के लिए तानाशाही कि जाति है, उलटे मृतक के परिवार का उत्पीड़न किया जाता है. लेकिन इतने बड़े समाज में से कोई नेता न्याय के लिए एक बयान तक नहीं देता.

समाज का मतलब और क्या होता है? भीड़तंत्र में समाज कि ताकत है जिसके दम पर न्याय कि उम्मीद कि जाती है. जब इतने बड़े आदमी तक को न्याय नहीं मिल सकता तो किस बात का समाज है?
साभार Shivam Singj Parmar

 #वीर_शिरोमणि_महाराणा_प्रताप_की_जयंती #महाराणा_प्रताप_मेवाड़_के_13वें_राजपूत_राजा_थे,,! उनका जन्म मेवाड़ के शाही राजपूत ...
09/05/2021

#वीर_शिरोमणि_महाराणा_प्रताप_की_जयंती

#महाराणा_प्रताप_मेवाड़_के_13वें_राजपूत_राजा_थे,,! उनका जन्म मेवाड़ के शाही राजपूत परिवार 9 मई 1540 को हुआ था।
#राजस्थान_के_कुंभलगढ़_में_जन्में_महाराणा_प्रताप, महाराणा उदयसिंह और महारानी जयवंती की संतान थे। #महाराणा_प्रताप_को_जितना_उनकी_बहादुरी_के_लिए जाना जाता है,उतनी ही उनकी दरिया दिली और प्रजा व #राज्य_से_उनका_प्रेम_जगजाहिर_है,,!!
हल्दी घाटी में मुगल शासक अकबर के खिलाफ लड़ा #गया_उनका_युद्ध_इतिहास_के_सबसे_चर्चित_युद्ध_में से है। इस युद्ध में अपनी छोटी सी सेना के साथ,उन्होंने #मुगलों_की_विशाल_सेना_को_नाकों_चने_चबवा_दिए। जंगल में रहकर घास की रोटी खाने का महाराणा प्रताप का किस्सा सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।

#महाराणा_प्रताप_के_युद्ध_हथियार
1. महाराणा प्रताप युद्ध के वक्त हमेशा एक भाला अपने साथ रखते थे, जिसका वजन 81 किलो था। वह इस भाले को एक हाथ से नजाते हुए दुश्मन पर टूट पड़ते थे।
2. युद्ध के वक्त महाराणा प्रताप 72 किलो का कवच पहनते थे।
3. इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप के भाले, कवच, ढाल और दो तलवारों का वजन कुल मिलाकर 208 किलोग्राम होता था।
4. महाराणा प्रताप के हथियार इतिहास के सबसे भारी युद्ध हथियारों में शामिल हैं।

#महाराणा_प्रतापः_परिचय_व_परिवार
1. महाराणा प्रताप का जन्म 09 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ था।
2. महाराणा प्रताप ने राजनैतिक वजहों से कुल 11 शादियां की थीं।
3. महाराणा प्रताप के कुल 17 बेटे और 05 बेटियां थीं।
4. महारानी अजाब्दे से पैदा हुए पुत्र अमर सिंह को महाराणा प्रताप का उत्तराधिकारी बनाया गया था।
5. अमर सिंह भी अपने पिता महाराणा प्रताप की तरह काफी बहादुर और पारक्रमी थे।
6. इतिहासकारों के अनुसार हल्दी घाटी युद्ध के वक्त अमर सिंह की आयु 17 वर्ष थी।
7. मेवाड़ की रक्षा करते हुए महाराणा प्रताप की 19 जनवरी 1597 को मृत्यु हुई थी।
8. बताया जाता है कि महाराणा प्रताप की मौत पर मुगल शासक अकबर भी बहुत दुखी एवं रोया था।
9. अकबर दिल से महाराणा प्रताप के गुणों,उनकी बहादुरी और चरित्र का बहुद बड़ा प्रशंसक था।

#महाराणा_प्रताप_के_10_वाक्य
1. समय इतना ताकतवर होता है कि एक राजा को भी घास की रोटी खिला सकता है।
2. मनुष्य का गौरव व आत्म सम्मान उसकी सबसे बड़ी कमाई होती है। इसलिए इनकी सदैव रक्षा करनी चाहिए।
3. अपने व अपने परिवार के साथ जो अपने राष्ट्र के बारे में भी सोचते हैं,वही सच्चे नागरिक होते हैं।
4. तब तक परिश्रम करो,जब तक तुम्हे तुम्हारी मंजिल न मिल जाए।
5. अन्याय व अधर्म आदि का विनाश करना पूरी मानव जाति का कर्तव्य है।
6. जो अत्यंत विकट परिस्थिति में भी हार नहीं मानते हैं, वो हार कर भी जीत जाते हैं।
7. जो सुख में अतिप्रसन्न और विपत्ति में डर कर झुक जाते हैं,उन्हें न तो सफलता मिलती है और न ही इतिहास उन्हें याद रखता है।
8. अगर सांप से प्रेम करोगे तो भी वह अपने स्वभाव अनुरूप कभी न कभी डसेगा ही।
9. शासक का पहला कर्तव्य अपने राज्य का गौरव और सम्मान बचाए रखना होता है।
10. अपना गौरव, मान-मर्यादा और आत्म सम्मान के आगे जीवन की भी कोई कीमत नहीं है।

#महाराणा_प्रताप_के_10_रोचक_किस्से
1. महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय घोड़े का नाम चेतक था। महाराणा प्रताप की तरह उनका घोड़ा भी बहुत बहादुर और समझदार था।
2. महाराणा प्रताप को बचपन में प्यार से कीका कहकर बुलाया जाता था।
3. महाराणा प्रताप और मुगल शासक अकबर के बीच हल्दी घाटी का विनाशकारी युद्ध 18 जून 1576 को हुआ था। इतिहास में हल्दी घाटी के युद्ध की तुलना महाभारत के युद्ध से की गई है।
4. इतिहासकारों के अनुसार हल्दी घाटी के युद्ध में न तो अकबर की जीत हुई थी और न ही महाराणा प्रताप हारे थे। इसकी वजह महाराणा प्रताप के मन में राज्य की सुरक्षा का अटूट जज्बा था।
5. हल्दी घाटी के युद्ध को टालने के लिए अकबर ने छह बार महाराणा प्रताप के पास अपने शांति दूत भेजे, लेकिन राजपूत राजा ने हर बार अकबर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
6. हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मात्र 20 हजार सैनिकों के साथ मुगल बादशाह अकबर के 80 हजार सैनिकों का डटकर सामना किया था। बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को झुका नहीं सका था।
7. महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और वफादार घोड़े ने भी दुश्मनों के सामने अद्भुत वीरता का परिचय दिया था। हालांकि इसी युद्ध में घायल होने से उसकी मौत हुई थी।
8. चित्तौड़ की हल्दी घाटी में आज भी महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक की समाधि मौजूद है।
9. चेतक ने अंतिम दम तक महाराणा प्रताप का साथ दिया। युद्ध में मुगल सेना से घिरने पर चेतक महाराणा प्रताप को बैठाकर कई फील लंबा नाला फांद गया था।
10. महाराणा प्रताप जितने बहादुर थे, उतने ही दरियादिल और न्याय प्रिय भी। एक बार उनके बेटे अमर सिंह ने अकबर के सेनापति रहीम खानखाना और उसके परिवार को बंदी बना लिया था। महाराणा ने उन्हें छुड़वाया था।

#ऐसे_वीर_सपूत_को_सम्मान_देने_हेतु_आप_सबसे_आग्रह_है_आज_रात_8बजे_दीप_जलाकर_उनको_सम्मान_दे।।

16/02/2021

प्रभु श्री राम के अनुज भ्राता लक्ष्मण के वंसज , वैश कुल शिरोमणि क्षत्रिय सम्राट सुहलदेव सिंह वैश की जयंती की आप सबो को हार्दिक बधाई।

राणा प्रताप की खुद्दारी,भारत माता की पूंजी है।ये वो धरती है जहा कभी,चेतक की टापे गूंजी है।।राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा हेत...
19/01/2021

राणा प्रताप की खुद्दारी,भारत माता की पूंजी है।
ये वो धरती है जहा कभी,चेतक की टापे गूंजी है।।

राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले महान्शासक हिन्दू ह्रदय सम्राट वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की पुण्यतिथि पर कोटिशःनमन
विनम्र श्रद्धांजलि🙏
#महाराणा_प्रताप 🙏

20/11/2020

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ..इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं. इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है की हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है.

क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे.

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है.

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे. कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए। युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया.उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई। महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है.ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया. दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.

दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी.

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है.

साभार - ओम उपाध्याय

महाराजा सार्दुल सिंह जी राठौड़ के नेतृत्व में बीकानेर की सेना( गंगा रिसाला) (1918 ई. का रियासतकालीन दृश्य)
27/10/2020

महाराजा सार्दुल सिंह जी राठौड़ के नेतृत्व में बीकानेर की सेना( गंगा रिसाला) (1918 ई. का रियासतकालीन दृश्य)

1582 ई. में विजयादशमी के पवित्र दिन 'मेवाड़ का मैराथन' कहे जाने वाले दिवेर के युद्ध में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने अकब...
25/10/2020

1582 ई. में विजयादशमी के पवित्र दिन 'मेवाड़ का मैराथन' कहे जाने वाले दिवेर के युद्ध में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने अकबर के सेनापति सुल्तान खां को परास्त कर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की थी

पेंटिंग में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप द्वारा सुल्तान खां के हाथी का कुम्भ फोड़ते हुए दिखाया गया है

जब सुल्तान खां ने घोड़े पर बैठकर युद्ध लड़ना प्रारंभ किया तो कुंवर अमरसिंह के भाले के भीषण प्रहार ने उसे घोड़े समेत मौत के घाट उतार दिया

इस विजय का परिणाम ऐसा रहा कि एक ही वर्ष में मेवाड़ी बहादुरों ने 36 मुगल थाने उखाड़ फेंके

दिवेर विजय की स्मृति के लिए दिवेर (राजसमन्द) में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का भव्य स्मारक स्थित है

पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत

जननायक कर्पूरी ठाकुर के राजनीतिक शिष्य और समाजवाद के अंतिम स्तंभ थे डाॅ रघुवंश प्रसाद सिंह : डाॅ रुपक कुमार सिंह के कलम ...
15/09/2020

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http://24republicbharat.com/1588/
जब डाॅ रघुवंश प्रसाद सिंह 2014 मे वैशाली लोकसभा का चुनाव हारे थे तो मैने एक आलेख लिखा था कि "लोग खुश है एनडीए के जीत पर और मै दुखी हूँ एक योग्य, इमानदार, सिद्धांतवादी और अंतिम समाजवादी नेता के हार पर। मोदी लहर के कारण एक विवादास्पद पृष्ठभूमि का व्यक्ति भले जीत गया हो पर रघुवंश नही हार सकता अगर कोई हारा है तो वह है सदन की आवाज, गांव गरीब का प्रतिनिधि, लोहिया-कर्पूरी का विचार और लोकतंत्र के अनुरूप कार्य करने वाला कर्तव्यनिष्ठ राजनेता।" काउंटिंग खत्म होता है रघुवंश समर्थक मायूस होकर निकलते है, रघुवंश बाबू एक करीबी के घर पर बैठे थे, हमेशा खैनी और पान खिलाने वाला समर्थक उनके पास मुंह लटकाकर पहुंचता है तो रघुवंश बाबू झट से बोले कि "मर्दे पनवा न खियाएगा का" जैसे पान आता है मुँह मे दबाकर चल देते है, न कोई शीकन, न किसी की आलोचना, न किसी से शिकायत। रघुवंश बाबू से वैशाली मे अनौपचारिक मुलाकात मे हमने पूछा दिल्ली मे आप कहाँ-कहाँ जाते है, तो जवाब मिलता है कि अपना सरकारी आवास, सदन, पार्टी कार्यालय, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन को छोड़ कर हमे कुछ नही देखा हुआ है। ऐसे ही मोहीउद्दीन नगर मे एक समारोह मे हमने देखा कि सब लोग चम्मच से तरह तरह के व्यंजन का स्वाद ले रहे थे और बगल मे बैठे रघुवंश बाबू दूध रोटी खा रहे थे। आज के युग मे कभी पार्टी व विचार न बदलने वाले एकमात्र राजनेता थे रघुवंश। हमे याद है UPA 2 मे कांग्रेस से राजद अलग हो गई, फिर भी रघुवंश बाबू को कांग्रेस ने लोकसभा का स्पीकर फिर कुछ दिन बाद डिप्टी स्पीकर बनाने की इच्छा जाहिर किया, इतना ही नही दुबारा ग्रामीण विकास मंत्री बनाने के लिए भी ऑफर मिला, पर इन्होने ठुकरा दिया, क्योंकि राजद ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था और ये राजद के प्रति निष्ठावान थे। जब ये सांसद हुआ करते थे तब पूरे बिहार मे बिजली की स्थिति काफी खराब थी पर वैशाली क्षेत्र मे 18 घंटे बिजली रहती थी, कारण सुरेश प्रभू केंद्रीय सरकार मे उर्जा मंत्री थे, रघुवंश बाबू ने बुद्ध महावीर की धरती रोशन हो इसके लिए 2600 गांव के लिए बिजली देने का आग्रह किया, सुरेश प्रभू ने तुरंत इस बजट को स्वीकृत कर दिया। हाजीपुर सुगौली भाया वैशाली रेलवे लाईन बनाने का प्रस्ताव इनका ही था जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी ने स्वीकृत कर लिया। जब ये ग्रामीण विकास मंत्री थे तब पूरे बिहार की ग्रामीण सड़को का सूरत बदल गया, इतने सड़क का निर्माण एक साथ हुआ कि चारो तरफ विकाश दिखने लगा, पर मुख्यमंत्री नीतीश जी थे इसलिए क्रेडिट नीतीश कुमार को ही मिल गया। पहले केन्द्र सरकार राज्यों के विकास के लिए जो पैकेज देती थी उसमें राज्यो को 30% राशि लगाना होता था, पर 100 फीसदी राशि केन्द्र सरकार राज्यो को देने लगी थी, इसका श्रेय इन्ही को जाता था। मोदी सरकार के आते ही पुनः 60% केन्द्र और 40% राज्य को विकाश कार्यो के लिए खर्च करना पड़ रहा है। जब ये केंद्र सरकार मे मंत्री थे तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने साक्षात्कार मे कहा था कि नरेगा/मनरेगा का कांसेप्ट डाॅ रघुवंश प्रसाद सिंह का है इसका क्रेडिट उन्हें मिलना चाहिए। उपयुक्त गुणों के अलावा वेबाक होकर अपनी बात रखने वाले इस नेता की तुलना बिहार ही नही बल्कि भारत के किसी भी राजनेता से करना बेईमानी होगी, दुर्भाग्य है कि ये जिस पार्टी मे रहे वह परिवारवाद और पुत्र मोह के कारण इनका कद्र करना भूल गया।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी जब भी रघुवंश बाबू को सदन मे देखते थे तो कहते हमारा Stalwart आ गया। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जी से सुना था कि रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता सदन की जरूरत है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि जी ने हमे बताया कि रघुवंश बाबू जब सांसद थे तब लोकसभा मे समय से जाना और पूरे कार्रवाही का हिस्सा बने रहना फिर समय से सदन से ही निकलते थे। इनको पार्लियामेन्ट्री ज्ञान बहुत था, हर विषय पर ये सदन मे अपना प्रश्न करते रहे है और बारीकी से अपना पक्ष भी रखते थे।
दो बार विधायक एक बार एमएलसी और सभापति, पांच बार सांसद, बिहार सरकार मे मंत्री के साथ केंद्र में एच डी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और मनमोहन सिंह के सरकार मे तीनो बार मंत्री रहे है।
जीवन के अंतिम क्षण जब ये जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे तब इन्होने एम्स, दिल्ली से वैशाली और बिहार से संबंधित कई महत्वपूर्ण छूटे कार्य को कराने के लिए मुख्यमंत्री और बड़े आला अधिकारी को पत्र लिखने के बाद सादे कागज पर लालू प्रसाद जी को यह लिखा कि जननायक कर्पूरी ठाकुर के बाद 32 साल तक आपके पीठ पीछे खड़ा रहा लेकिन अब नही...।
रघुवंश बाबू ने अंतिम समय मे पार्टी तो छोड़ा पर पार्टी नही बदला। लालू जी के पुत्र तेजप्रताप ने इनको "एक लोटा पानी" के बराबर समझा था, इसलिए रघुवंश बाबू का राजद से इस्तीफा देना सही निर्णय था, जहाँ सुनने वाला कोई नही हो, जहाँ सम्मान न मिले वहाँ एक पल भी नही रुकना चाहिए। रघुवंश बाबू आप "एक लोटा पानी" नही बल्कि "लालटेन के तेल" थे अब बिना तेल लालटेन नही जल सकता...।
आपका जाना राजनीति से इमानदार चरित्र का लुप्त हो जाना, समाजवादी युग का अंत हो जाना है। अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि, शत् वार नमन् । (डाॅ. रुपक कुमार)

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