16/03/2026
आज कलेजा फट रहा है यह देखकर कि जिस मनीष ने सियाचिन की हाड़ कंपाने वाली ठंड में देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी, आज उसके घर में मातम पसरा है। बूढ़े मां-बाप का रो-रोकर बुरा हाल है, घर की दीवारें मनीष की वीरता की गवाही दे रही हैं, लेकिन हमारे 'माननीय' गायब हैं!
कहाँ हैं हमारे नेता?
• क्षेत्रीय विधायक जी: चुनाव के वक्त तो आप हर गली के चक्कर काटते हैं, आज एक शहीद के आंगन तक आने का रास्ता भूल गए?
• सांसद और राज्यसभा सदस्य: दिल्ली की राजनीति से फुर्सत मिले तो जरा इस मिट्टी के लाल के घर भी झांक लीजिए, जिसकी बदौलत आप चैन की नींद सोते हैं।
• मंत्री महोदय: बड़े-बड़े भाषणों में 'देशभक्ति' शब्द बहुत अच्छा लगता है, लेकिन धरातल पर आपकी यह अनुपस्थिति आपकी संवेदनहीनता का प्रमाण है।
क्या मनीष की शहादत सिर्फ एक खबर बनकर रह जाएगी?
क्या एक 'अग्नवीर' का बलिदान इतना छोटा है कि सत्ता के गलियारों में बैठे इन रसूखदारों को उनके घर जाने में शर्म आ रही है? याद रखिए, ये पद और ये कुर्सियां जनता की दी हुई हैं। अगर आप शहीद के परिवार के दुख में शामिल नहीं हो सकते, तो आपको 'जनप्रतिनिधि' कहलाने का कोई हक नहीं है।
धिक्कार है ऐसी राजनीति पर जो वोटों के लिए तो घर-घर पहुँचती है, लेकिन शहादत के सम्मान में कदम पीछे खींच लेती है।
मनीष भाई, देश तुम्हारा कर्जदार रहेगा। भले ही ये नेता तुम्हें भूल जाएं, लेकिन यह मिट्टी और यह समाज तुम्हारी शहादत को हमेशा नमन करेगा। 🫡🇮🇳